धार्मिक आंदोलन
छठी शताब्दी ई.पू. धार्मिक आन्दोलनों की शताब्दी मानी जाती है। इस समय यूनान में पाइथागोरस, ईरान में जरथुष्ट तथा चीन में कन्फ्यूशियस धर्म का उदय हुआ। इसी समय भारत में प्रचलित वैदिक धर्म में अनेक बुराइयाँ और कुरीतियाँ प्रवेश कर चुकी थी। तत्पश्चात दो प्रमुख धर्म जैन और बौद्ध धर्म अस्तित्त्व में आया।
जैन धर्म
महावीर स्वामी
जैन धर्म के महापुरूषों को तीर्थंकर कहा जाता है। स्वामी महावीर 24वें तीर्थंकर थे। उन्होंने जैन धर्म को नया स्वरूप प्रदान किया ।
स्वामी महावीर का जन्म 540 ई.पू. में वैशाली के निकट हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ तथा माता का नाम त्रिशला देवी था।
इनके बचपन का नाम वर्धमान था। तीस वर्ष की उम्र में वर्धमान ने अपने बड़े भाई की आज्ञा प्राप्त कर सन्यास धारण किया । 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद उन्हें कैवल्य अर्थात् सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई । कठोर तपस्या और सहनशीलता के कारण उन्हें महावीर कहा गया एवं इंद्रियों के विजेता होने के कारण उन्हें जिन भी कहा गया। 72 वर्ष की आयु में पावापुरी नामक स्थान में इनका निर्वाण हुआ।
जैन धर्म: दर्शन तथा सिद्धान्त
- पालि धर्मग्रन्थों में महावीर को जैन धर्म का संस्थापक नहीं बल्कि प्रवर्तक माना गया है।
- महावीर से पहले पार्श्वनाथ ने चार जैन सिद्धान्त दिए थे। ये हैं-सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह तथा अस्तेय। महावीर ने इसमें पांचवां सिद्धान्त ब्रह्मचर्य जोड़ा।
- जैन धर्म में स्यादवाद के दर्शन, जिसमें सात सत्य शामिल हैं, को अनेकान्तवाद भी कहा जाता है।
- जैन दर्शन सांख्य दर्शन के निकट है। इसमें दो मूल तत्त्वों (जीव एवं अजीव ) की सत्ता को स्वीकार किया गया है। जैन धर्म में कर्म सिद्धान्त को महत्त्व दिया गया है। मोक्ष को जीव का परम लक्ष्य बताया गया है।
- जैन धर्म के त्रिरत्न हैं—सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् आचरण जैन धर्म में आत्मा की सत्ता को स्वीकार किया गया है।
जैन संघ
- महावीर ने समस्त अनुयायियों को 11 गणों में विभक्त किया तथा प्रत्येक गण में एक प्रधान (गणधर) नियुक्त कर धर्म प्रचार का उत्तरदायित्व प्रदान किया।
- जैन संघ दो भागों में विभाजित हुआ- दिगम्बर (भद्रबाहु के समर्थक) तथा श्वेताम्बर (स्थूलभद्र के समर्थक)। इन सम्प्रदायों का विभाजन विभिन्न विचारों के आधार पर हुआ था।
- श्वेताम्बर सफेद वस्त्र धारण करते थे, जबकि दिगम्बर बिना वस्त्रों के जीवन व्यतीत करते थे।
जैन धर्म ग्रन्थ
- जैन धर्म ग्रन्थों की रचना प्राकृत भाषा में हुई है।
- जैन ग्रन्थों को पूर्व या आगम कहा जाता है। इसमें 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र एवं 4 मूलसूत्र शामिल हैं।
- चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में आयोजित प्रथम जैन संगीति में आगमों का संकलन 'अंगों' में हुआ।
- द्वितीय जैन संगीति में अंगों का पुनः संकलन हुआ। अंगों की संख्या 12 थी, किन्तु एक अंग के खोने के बाद अंगों की संख्या 11 रह गई।
- जैन ग्रन्थों में परिशिष्ट पर्व, आचारांग सूत्र, कल्पसूर, भगवती सूत्र, भद्रबाहुचारित आदि महत्त्वपूर्ण हैं।
- जैन तीर्थंकरों का जीवन चरित भद्रबाहु रचित कल्पसूत्र में है।
बौद्ध धर्म
गौतम बुद्ध
बौद्ध धर्म की स्थापना महात्मा गौतम बुद्ध ने की थी । गौतम बुद्ध स्वामी महावीर के समय के ही थे। महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी नामक स्थान में हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था । गौतम बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन तथा माता का नाम मायादेवी था।
कहा जाता है कि एक दिन सिद्धार्थ महल से बाहर निकले तो उन्होंने सबसे पहले एक अत्यंत बीमार व्यक्ति को देखा। थोड़ा आगे जाने पर उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा तथा अन्त में एक मृत व्यक्ति को देखा। इन दृश्यों से उनके मन में प्रश्न उठा कि क्या मैं भी बीमार पडूंगा, बूढ़ा हो जाऊँगा और मर जाऊँगा। इन प्रश्नों ने उन्हें काफी परेशान कर दिया था। तभी उन्होंने एक परिब्राजक (सन्यासी) को देखा। इससे 29 वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया और सन्यास ग्रहण कर लिया। सिद्धार्थ ने ज्ञान की खोज में छः वर्षों तक कठोर तपस्या की । आपने एक पीपल के पेड़ के नीचे कठोर तपस्या की जहां पर उन्हें सत्य का ज्ञान हुआ, जिसे संबोधि कहा गया। उस पीपल के पेड़ को तभी से बोधि-वृक्ष कहा जाता है। महात्मा गौतम बुद्ध को जिस स्थान पर बोध या ज्ञान प्राप्त हुआ वह स्थान बोधगया कहा जाता है।
महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था। 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ ।
बौद्ध धर्म, दर्शन तथा सिद्धान्त
- बुद्ध ने आम जनता की भाषा पालि में अपने उपदेश दिए। बौद्ध धर्म के सिद्धान्त चार आर्य सत्यों पर आधारित हैं।
- चार आर्य सत्य हैं - दुःख है, दुःख का कारण है, दुःख का निदान है और दुःख निदान के उपाय हैं।
- बौद्ध दर्शन में दुःखों के कारण कार्य चक्र को प्रतीत्यसमुत्पाद कहा गया है। दुःखों का मूल कारण तृष्णा है।
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बुद्ध ने निर्वाण (मोक्ष) प्राप्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया।
- सम्यक दृष्टि (Right View): चार आर्य सत्यों को समझना और वास्तविकता को सही दृष्टिकोण से देखना।
- सम्यक संकल्प (Right Intention): मानसिक और नैतिक विकास के लिए दृढ़ निश्चय करना, जैसे- राग और द्वेष से मुक्ति का संकल्प।
- सम्यक वाक् (Right Speech): सत्य बोलना, झूठ, चुगली, कठोर वचनों और व्यर्थ की बातों से बचना।
- सम्यक कर्म (Right Action): अहिंसा, चोरी न करना, और नैतिक आचरण जैसे अच्छे कर्म करना।
- सम्यक आजीविका (Right Livelihood): ईमानदारी और नैतिक तरीके से जीविकोपार्जन करना, हानिकारक व्यापार से बचना।
- सम्यक व्यायाम (Right Effort): मन में कुविचारों को रोकने और शुभ विचारों को विकसित करने का निरंतर प्रयास करना।
- सम्यक स्मृति (Right Mindfulness): अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों के प्रति सचेत या जागरूक रहना।
- सम्यक समाधि (Right Concentration): मन की एकाग्रता, जो ध्यान के माध्यम से मानसिक शांति लाती है।
- अष्टांगिक मार्ग को भिक्षुओं का कल्याण मित्र कहा गया है। बौद्ध धर्म में नैतिकता पर बल दिया गया है।
- महात्मा बुद्ध ने कर्म के सिद्धान्त पर बल दिया तथा सत्य और अहिंसा को प्रमुखता दी। निर्वाण (मोक्ष) को अन्तिम लक्ष्य स्वीकार किया गया।
- बौद्ध धर्म में वेदों की प्रमाणिकता को अस्वीकार किया गया है।
- बौद्ध धर्म मूलतः अनीश्वरवादी है। बुद्ध ने आत्मा की परिकल्पना को भी अस्वीकार किया। यद्यपि पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार किया गया।
- बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं- बुद्ध धम्म एवं संघ
- बौद्ध प्रतीकों में कमल एवं सांड जन्म का, घोडा गृहत्याग का, पीपल ज्ञान का, पदचिह्न निर्वाण का एवं स्तूप मृत्यु का प्रतीक है।
त्रिपिटक
- सुत्तपिटक: इसमें बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का उल्लेख है।
- विनयपिटक: इसमें बौद्ध संघ के नियमों की व्याख्या की गई है।
- अभिधम्मपिटक इसमें बौद्ध दर्शन पर प्रकाश डाला गया है।
बौद्ध ग्रन्थ
- अधिकांश बौद्ध ग्रन्थों की रचना पालि भाषा में हुई है।
- संस्कृत बौद्ध ग्रन्थों में अश्वघोष रचित 'बुद्धिचरित', 'सौन्दरानन्द', 'सारिपुत्रप्रकरण' प्रमुख है।
- संस्कृत भाषा में रचित 'महावस्तु' ग्रन्थ महात्मा बुद्ध के जीवन वृत्त से सम्बन्धित है।
- विशुद्धिमग्ग, बुद्धघोष द्वारा रचित हीनयान सम्प्रदाय का ग्रन्थ है।
- ललितविस्तर, सधर्म पुण्डरीक, वज्रच्छेदिका, सुखावती व्यूह, अष्ट सहस्विक प्रज्ञापारमिता, महायान से सम्बन्धित हैं।
बौद्ध सम्प्रदाय
- महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध धर्म कई सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। इसमें प्रमुख हैं- हीनयान तथा महायान
-
हीनयान महात्मा बुद्ध के दर्शन तथा सिद्धान्तों में विश्वास करने वाला सम्प्रदाय था, जबकि महायान सम्प्रदाय को मानने वाले बुद्ध के साथ बोधिसत्वों के जीवन तथा सिद्धान्तों में भी विश्वास रखते थे।
छठी सदी ई. पू. के कुछ अन्य सम्प्रदाय
| सम्प्रदाय |
संस्थापक |
| भौतिकवादी |
अजित केस-कम्बलिन |
| अक्रियावादी |
पूरण कश्यप |
| आजीवक |
मक्खलि गोशाल |
| नियतिवादी |
पकुध कच्चायन |
| अनिश्चयवादी |
संजय वेलिट्ठपुत्र |