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उत्तर वैदिक काल

 उत्तरवैदिक काल वह काल था जब यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद की रचना हुई। इस समय वैदिक संस्कृति सिंधु-सरस्वती नदियों के क्षेत्र से आगे बढ़कर गंगा-यमुना नदी के मैदान तक फैल चुकी थी। इस काल में कृषि की उन्नति के कारण नए उद्योग-धंधों का भी विकास हुआ। इससे राज्यों का बनना और विकास होना भी शुरू हो गया ।

जनपद

 जन के लोग जिस क्षेत्र में निवास करते थे वह उनको जनपद कहा जाने लगा । जैसे- -कुरुजनपद, पांचाल जनपद, सूरसेन जनपद आदि।

सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था

 वैदिक काल में संयुक्त परिवार का प्रचलन था। सभी भाई व कई पीढ़ी के लोग एक ही परिवार में साथ-साथ रहते थे। सबसे बुजुर्ग पुरूष परिवार का मुखिया होता था । उसे गृहपति कहते थे। सभी लोग उसकी बात मानते थे ।
 वैदिक साहित्य के अनुसार प्रत्येक मनुष्य का जीवन चार अवस्थाओं में बँटा था जिसे आश्रम-व्यवस्था कहा जाता था। इनमें पहला था ब्रह्मचर्य आश्रम - इसमें मनुष्य बाल्यावस्था में शिक्षा प्राप्त करता था। दूसरा, गृहस्थ आश्रम - इसमें मनुष्य विवाह कर परिवार चलाता था। तीसरा, वानप्रस्थ आश्रम–इसमें मनुष्य परिवार से दूर रहकर चिंतन-मनन करता था। चौथा, सन्यास आश्रम - इसमें मनुष्य घर परिवार से दूर होकर तीर्थ-यात्रा करते हुए जीवन का अंतिम समय व्यतीत करता था।
 उत्तर वैदिक काल में ज्यादातर गृहपति खेती और पशुपालन करते थे। इन्हें वैश्य कहा जाता था। इन गृहपतियों के आस-पास उनकी सेवा करनेवाले सेवक लोग भी रहते थे। गृहपति समय-समय पर राजा को भेंट दिया करते थे। जिससे राजा और राज्य का खर्च चलता था ।
 पूरे जन के मुखिया को राजा कहते थे। उसके रिश्तेदार और सहयोगियों को राजन्य कहा जाता था। उनका मुख्य काम जनपद की रक्षा करना था। लेकिन युद्ध के समय पहले की तरह ही जन के सारे पुरूष सम्मिलित होते थे।
 उत्तर वैदिक-साहित्यों से पता चलता है, कि राजा और राजन्य बड़े-बड़े यज्ञ करने लगे थे। जैसे— अश्वमेघ यज्ञ, राजसूय यज्ञ आदि । जो कई महीने चलते थे। इनमें बहुत धन खर्च होता था। इन यज्ञों को ब्राह्मण या पुरोहित संपन्न कराते थे । ब्राह्मणों को धन, गायें आदि दान में प्राप्त होते थे। उनकी मान्यता थी कि इन यज्ञों से जनपद में खुशहाली आएगी तथा राजा शक्तिशाली बनेगा।
 उत्तर वैदिक काल में समाज चार वर्णों में बँटा था। पहला ब्राह्मण वर्ण, जो यज्ञ करवाते थे और वेद पढ़ते-पढ़ाते थे। दूसरा क्षत्रिय वर्ण, जो जनपद में शासन और उसकी रक्षा करते थे। तीसरा वैश्य वर्ण, जो जनपद में खेती और पशुपालन करते थे । चौथा शूद्र वर्ण, जो सेवा - कार्य करते थे । वर्ण-व्यवस्था के कारण ही आगे चलकर समाज में जाति-व्यवस्था पनपी ।

कृषि का विकास और भौतिक समृद्धि

 उत्तर वैदिक काल में कृषि की उन्नति हुई । किसान कई प्रकार के अन्न का अधिक मात्रा में उत्पादन करने लगे, जैसे- चावल, गेंहू, तिलहन, दाल आदि।
 उत्तर वैदिक काल में कृषि की उन्नति हुई । किसान कई प्रकार के अन्न का अधिक मात्रा में उत्पादन करने लगे, जैसे- चावल, गेंहू, तिलहन, दाल आदि। खेती की उन्नति के कारण वैदिक कालीन समाज में भौतिक समृद्धि दिखाई देने लगी । इस समय नए-नए आभूषण, चमड़े की चीजें, लकड़ी की चीजें बनानेवाले कुशल कारीगर होने लगे। इसके साथ ही विभिन्न धातुओं का उपयोग लोगों के जीवन में बढ़ने लगा । विशेष रूप से वे लोहे का उपयोग करने लगे थे। इसे वे कृष्ण अयस्क या काला धातु कहते थे । इन सबकी जानकारी हमें वैदिक ग्रंथों से मिलती है। खुदाई से उस समय की चीजें जैसे मिट्टी के बर्तन, लोहे के औज़ार आदि चीजें मिली है।

महाकाव्यों की रचना

 हमारे देश के दो महाकाव्यों रामायण और महाभारत की रचना उत्तर वैदिक काल की बातों पर आधारित है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रामायण की रचना कोसल जनपद की बातों पर आधारित है। इसी प्रकार महर्षि व्यास द्वारा महाभारत की रचना कुरू, पांचाल और सूरसेन जनपद की बातों पर आधारित है। ये दोनों महाकाव्य भारतीय संस्कृति के आधार हैं। इन महाकाव्यों ने मानव जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। इनके अध्ययन से हमें इस समय के इतिहास की जानकारी मिलती है।